क्या चीन-पाकिस्तान-बांग्लादेश के खिलाफ ट्रम्प ने भारत को फ्री हैंड दे दिया है?
अमेरिकी स्टेट गेस्ट ब्लेयर हाउस, जहां मोदी रुके थे— वहां किसी भी गेस्ट लीडर के लिए इससे पहले इतना सम्मान नहीं दिखा। प्रधानमंत्री मोदी से मिलने के लिए लोगों की लंबी कतारें लगी थीं। अमेरिकी सरकार के शीर्ष अधिकारियों के अलावा बड़े-बड़े कारोबारी भी उनसे मिलने पहुंचे। एलोन मस्क को पता है कि प्रधानमंत्री मोदी की बच्चों के साथ खास बॉन्डिंग है, इसलिए वे अपने परिवार को लेकर ब्लेयर हाउस आए। वे प्रधानमंत्री के साथ देर तक रुके। इस दौरान, एलोन मस्क के बच्चों ने अपनी मासूम शरारतों से पूरी महफ़िल लूट ली। तुलसी गबार्ड, माइक वाल्ट्ज, विवेक रामास्वामी सहित कई अन्य गणमान्य लोग भी मोदी से मिलने पहुंचे।
इस ऐतिहासिक मीटिंग में दोनों नेताओं ने दिल खोलकर बातचीत की और अहम सौदे तय हुए। ट्रम्प ने प्रधानमंत्री मोदी को कई ऐसी चीजें देने पर सहमति जताई, जिन्हें लेकर अमेरिका हमेशा आनाकानी करता रहा था। ट्रम्प ने भारत और मोदी के नेतृत्व की सराहना करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी एक 'टफ नेगोशिएटर' (कठिन सौदेबाज) हैं। इस डील के प्रमुख मुद्दे थे— खालिस्तानी आतंकवाद, अमेरिका के स्टील्थ फाइटर जेट एफ-35 का अधिग्रहण, मुंबई हमलों के आरोपी पाकिस्तानी मूल के कारोबारी तहव्वुर राणा का भारत को प्रत्यर्पण, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सामरिक मोर्चेबंदी और बांग्लादेश को लेकर भारत को फ्रीहैंड देना।
अमेरिका अपने पाँचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर जेट एफ-35 को केवल इजरायल, जापान और नाटो देशों को ही देता है। अमेरिका आमतौर पर अपने सबसे उन्नत हथियार किसी अन्य देश को बेचना पसंद नहीं करता, और अगर किसी को देता भी है, तो उसे इस्तेमाल करने की सीमित अनुमति ही देता है। यूक्रेन युद्ध के दौरान अमेरिका ने आर्मी टैक्टिकल मिसाइल सिस्टम तो बेचीं, लेकिन उनके इस्तेमाल की अनुमति बहुत देर से दी। ये मिसाइल सिस्टम तो यूक्रेन के लिए सही पीस ज्यादा कुछ रही नहीं। जो बाइडन ने अपने कार्यकाल के बिल्कुल आखिरी दिनों में आर्मी टैक्टिकल मिसाइल सिस्टम को रूस पर इस्तेमाल करने की अनुमति दी। मगर भारत एक मामले में ट्रम्प ने अपना टॉप फाइटर जेट एफ-35 भारत को ऑफर कर दिया। भारत लंबे समय से एफ-35 खरीदना चाहता था, और अब यह डील लगभग पक्की है।
भारत को अमेरिका से इस डील में और भी कई रणनीतिक लाभ मिले हैं। फ्रांस से भारतीय नौसेना के लिए राफेल फाइटर जेट की खरीदी हो रही और अब अमेरिका से एफ-35 का अधिग्रहण यह साबित करता है कि चीन को घेरने की तैयारी पूरी हो चुकी है। बांग्लादेश को लेकर भी ट्रम्प प्रशासन ने भारत को फ्रीहैंड दे दिया है। यह नजर आ रहा।
वाशिंगटन में बड़ी संख्या में बांग्लादेशी मूल के लोग ट्रम्प और पीएम मोदी से मदद की उम्मीद में पहुंचे थे। यह दोनों नेताओं की द्विपक्षीय बैठक में बातचीत का एक बड़ा मुद्दा था, जिसे मुख्यधारा की मीडिया ने अधिक तवज्जो नहीं दी। और ट्रम्प की भारत से कथित नाराजगी, संभावित टैरिफ जैसी चीजों के जरिए लगातार सनसनी फैलाने के प्रयास किए। वाशिंगटन में जब प्रेस ब्रीफिंग के दौरान ट्रम्प से बांग्लादेश पर सवाल पूछा गया, तो उनका जवाब स्पष्ट था— ‘प्रधानमंत्री मोदी इस पर काम कर रहे हैं।’ ट्रम्प ने खुलकर नहीं बताया, लेकिन यह स्पष्ट कर दिया कि अमेरिका, भारत के रुख के साथ खड़ा है और इस मसले पर भारत की कोई ठोस योजना चल रही है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि ग्लोबल साउथ के अगुआ के रूप में ट्रम्प प्रशासन भारत को अहमियत देता है जो चीन के फ्रंट की वजह से उसकी कूटनीतिक मजबूरी भी है। वह चाहकर भी भारत को ना तो नजरअंदाज कर सकता है और ना ही नाराज। यह भारत की अहमियत ही है जो जाते जाते बाइडन प्रशासन ने भी एक तरफ पाकिस्तान के परमाणु मिसाइल कार्यक्रम पर प्रतिबंध लगाया था और दूसरी तरफ भारत को एलिट क्लब में शामिल करते हुए साझा विकास के मुद्दों पर समझौते किए।
अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर भारत और अमेरिका का रुख स्पष्ट है और उसमें भविष्य के कुछ संकेत भी साफ़ दिखे। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा— ‘जो लोग अवैध तरीके से दूसरे देशों में रहते हैं, उन्हें वहाँ रहने का कोई अधिकार नहीं।’ भारत का यह बयान उस दिशा में है कि अगर अमेरिका में भारत के अवैध प्रवासी हैं तो ये बात नाजायज है और भारत को भी अपने यहाँ से अवैध प्रवासियों को बाहर निकालने का हक है। यह बयान इशारा करता है कि भारत जल्द ही घुसपैठियों के खिलाफ एक बड़ा अभियान शुरू करने जा रहा।
खालिस्तानी आतंकवाद के मुद्दे पर ट्रम्प ने सीधे सीधे कुछ नहीं कहा मगर यह बात स्वीकार की कि बाइडन प्रशासन के दौरान भारत-अमेरिका संबंधों में "कुछ गलतियाँ" हुई थीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि ट्रम्प प्रशासन अमेरिका मे शरण लिए भारत विरोधी आपराधिक आतंकी तत्वों के खिलाफ मिलकर काम करेगा। जहां तक व्यापार घाटे की बात है, भारत ने अमेरिका से अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए तेल और एलएनजी गैस वगैरह की डील की है। अमेरिका के साथ भारत का व्यापार घाटा दूसरे देशों के मुकाबले बहुत कम है। रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर भी भारत ने ट्रम्प के रुख का समर्थन किया। इससे यह संकेत मिलता है कि ट्रम्प, पुतिन, मोदी और नेतन्याहू की रणनीतिक साझेदारी बन रही है, जो वैश्विक राजनीति को एक नए संतुलन की ओर ले जा सकती है।
भारत-अमेरिका के बीच हुई हथियारों की डील और तीसरे देशों के तमाम मुद्दों को लेकर हुई सहमति का एकमात्र उद्देश्य चीन की सामरिक मोरचेबंदी करना है। हाल ही में, दक्षिण चीन सागर में एक चीनी लड़ाकू विमान ने ऑस्ट्रेलियाई सैन्य विमान के सामने फ्लेयर छोड़े, जो लगभग एक उकसाने वाली कार्रवाई थी। ऑस्ट्रेलिया ने इसे लेकर चीन के खिलाफ सख्त आपत्ति दर्ज कराई है। लेकिन चीन ने गलती मानने के बजाय दावा किया कि ऑस्ट्रेलियाई विमान उसके हवाई क्षेत्र में घुसा था, इसलिए उसने वैध और संयमित जवाब दिया।
चीन का यह रवैया नया नहीं है। जापान, ताइवान, भारत, फिलीपींस— हर पड़ोसी देश को वह इसी तरह धमकाता है। यहां तक कि रूस, जो चीन का सहयोगी माना जाता है, उसकी जमीन पर भी चीन ने दावे कर रखे हैं। क्वाड (भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया) चीन की इसी दादागिरी को रोकने के लिए बना है, और चीन की इस तरह की दादागिरी रोकने की दिशा में कम से कम भारत के सामने और अमेरिका में ट्रम्प प्रशासन के रहते रूस कभी आड़े नहीं आएगा।
मोदी के फ्रांस और अमेरिका दौरे से निकल रहे तमाम संकेत सिर्फ एक बिन्दु की तरफ की इशारा करते हैं।
2030 से पहले भारत का बिना जंग के आगे बढ़ना लगभग असंभव है। अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन में भारत अब उस स्तर पर पहुंच चुका है, जहां टकराव टाला नहीं जा सकता। एशिया से यूरोप तक कई ताकतें भारत को कमजोर करना चाहती हैं। यहां तक कि बांग्लादेश जैसे छोटे देश भी अब भारत को आंख दिखाने लगे हैं। ऐसे में भारत को भी अपनी सैन्य ताकत को नई ऊँचाइयों पर ले जाना होगा। इसके अलावा अब कोई चारा भी नहीं बचा। क्योंकि भारत के पड़ोसी देशों में चीन जिस तरह अपनी भूमिका का इस्तेमाल कर भारत को परेशान करने का दुष्चक्र रच रहा- भारत की तरफ से भाय के हथियार का इस्तेमाल करना जरूरी हो गया है।
इसी दिशा में हाल ही में भारत ने रूस से युद्धपोत लिए हैं। आईएनएस तुशील भारतीय नौसेना में शामिल हो चुका है। डीआरडीओ और भारतीय नौसेना ने समुद्र से लॉन्च की जाने वाली परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल K-4 का सफल परीक्षण किया, जिसकी मारक क्षमता 3500 किमी है। भारत ने हाइपरसोनिक मिसाइल परीक्षण भी किया गया। ढेर सारे रक्षा अनुसंधान, हथियारों के सौदे हो रहे और भारत अपने रक्षा उपकरणों को अपडेट भी कर रहा। भारतीय सीमाओं पर सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर का तेजी से विकास हो रहा।
भारत की नीति स्पष्ट है— ‘पहली गोली नहीं चलाएंगे, लेकिन अगर दुश्मन ने भारत पे हमले चूक की, तो उसे किसी लायक छोड़ेंगे भी नहीं।’ कई ताकतें भारत को डराने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन भारत अब किसी से दबने वाला नहीं। चीन के साथ पहले भी युद्ध जैसी स्थिति आ चुकी है, लेकिन भारतीय सेना ने उसे पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। चीन के साथ लगाने वाली नियंत्रण रेखा पर पहले डोकलाम और फिर गलवान के बाद पिछले छह सात सालों से जो कुछ हो रहा उसका प्रमाण मौजूद है। अब जब भारत अपनी नेवी की ताकत में ना सिर्फ इजाफा कर रहा बल्कि चीन के छठी जेनरेशन की फाइटर जेट के मुकाबले पाँचवीं जेनरेशन का जेट खरीद रहा तो चीन के लिए यह भारत का एक संदेश ही है।
भारत की समुद्री शक्ति को बढ़ाने के लिए रूस और फ्रांस के साथ हुई डील भी इसी रणनीति का हिस्सा हैं। आने वाले समय में भारत अपनी सामरिक स्थिति को और मजबूत करेगा, जिससे वह वैश्विक राजनीति में एक निर्णायक शक्ति बनकर उभरेगा।


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